Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
एकसिद्धौ द्वयोः सिद्धिर्बोधवैतृष्ण्यदीपयोः ।
मतिवात्याधुतो व्योम्नि दग्धो ज्ञानाग्निनाखिलः ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
तब ज्ञानरूपी अग्नि से भस्मीभूत हुई जगत्-रूपी सब रुई बुद्धिरूपी
झंझावात से शीघ्र उड़कर परम शान्त चिदाकाश में न जाने कहाँ चली जाती है