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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

करुणादिषु तेष्वस्य भ्रमञ्छाखान्तरेषु सः । लोभव्यालमधः कुर्वन्सम्राडिव विराजते ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्णं भूतो पर करुणा आदिरूप (&) इस वृक्ष की शाखाओं में भ्रमण कर रहा यानी व्युत्थानकाल में विहार कर रहा यह मनरूपी मृग लोभ आदिरूप व्यालो को नीचे करके पूर्णकाम सम्राट्‌ की तरह शोभित होता है