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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

हसत्युच्चैः पदारूढमात्मानभवलोकयन् । एतावन्तमहं कालं कृपणः कोऽभवं त्विति ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि उसे कुछ पहले का स्मरण हुआ, तो भी वह जोर से हँसने लग जाता है और अपने को ऊँचे विवेकवृक्ष के ऊपर चढ़ा देखकर विचारता है कि इतने समय तक मैं विषय- सुखो की लालच से कितना दीन बना था