Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
तेनोत्तमफलार्थेन संस्कारान्प्राक्तनानसौ ।
विवेकपादपारूढस्त्यजत्यहिरिव त्वचम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त उत्तम फल की इच्छा से
विवेकरूपी वृक्ष पर चढ़ा हुआ पुरुष अपने पहले के संस्कारों को उस तरह छोड़ देता है, जिस तरह
साँप अपनी केंचुल को छोड़ देता है । संस्कारों का त्याग कर देने से पहले का कुछ भी स्मरण नहीं
होता, यह भाव है