Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
विवेकवृक्षपान्नाम वृत्तीस्त्यजति भूगताः ।
उन्नतं पदमासाद्य भूयो नाधः समीहते ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
केसे चढ़ता है, इसे कहते हैं /
जो अध्यवसायी जड़ता है, वह सबसे पहले विवेक वृक्ष के ऊपर अपना पैर दृढ़ जमा लेता है,
फिर पहले की संसारवृत्तियों का एकदम त्याग कर देता है। ऐसा करने पर वह ऐसे ऊँचे स्थान पर
अपना स्थान बना लेता है कि फिर कभी नीचे नहीं गिरता