Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 46, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 46, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
तावद्विषयवैरस्यं भावयन्त्युचिताशयाः ।
न पश्यन्त्येव तान्यावद्भोगांश्चित्रनरो यथा ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
उस योगी को परम वैराग्य भी अर्थतः सिद्ध हो जाता हैं, यह कहते हैं /
निर्मल अन्तःकरणवाले योगी लोग विषयों में नीरसता की अनायास ही भावना करने लग जाते
हैं। वे उन सभी सांसारिक भोंगों को ऐसे नहीं देखते, जैसे कि चित्रगत मनुष्य चित्र में लिखित पुरुषों
को