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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 46, Verses 10–11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 46, verses 10–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 10,11

संस्कृत श्लोक

विरसाखिलभोगस्य प्रशान्तेन्द्रियसंविदः । नीरसाशेषदृश्यस्य स्वात्मारामस्य योगिनः ॥ १० ॥ क्रमेण विगलद्वृत्तेर्बलाद्विश्रान्तिमीयुषः । अर्थायातं समाधानं केन नाम विचार्यते ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

ध्यान के समान ही उप्र योगी की समाधि भी अनायास चिद्ध ढो जाती है यह कहते हैं । सम्पूर्ण भोगों से शून्य, इन्द्रियों की वृत्तियों को शान्त किये हुए, सम्पूर्ण दृश्य पदार्थों में अभिरुचि न रखनेवाले, एकमात्र अपनी आत्मा में ही रमण करनेवाले, क्रमश: अपनी वृत्तियों को गलाये हुए तथा बिना किसी प्रयास के विश्रान्ति प्राप्त कर चुके योगी की समाधि अर्थतः सिद्ध हो जाती है, इस विषय में जब वह ब्रह्मस्वरूप हो गया तब विचार ही करने कौन चलता है ?