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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 46, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 46, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

यस्य स्वभावविश्रान्तिः कथं तस्यास्ति भोगिता । अस्वभावो हि भोगित्वं तत्क्षये तत्कथं कुतः ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्ण अद्रय स्वभाव से विरुद्ध भोग उसी समय में हो सकता हैं, जिस समय में अज्ञान के कारण आत्मा का असली स्वरूप विपरीत प्रतीत होता हैं जक अज्ञान का नाश हो जाता है तब, यह बात नहीं रहती, यह कहते हैं । जिस महामुनि की अपने आत्मस्वभाव से स्थिति हो चुकी उसे भोग कैसे ? क्योंकि आत्मविरुद्ध स्वभाव ही भोग है, वह विरुद्ध स्वभाव के क्षीण हो जाने पर कैसे रह सकता है ?