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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । संसारभारसुश्रान्तः संकटेषु लुठत्तनुः । योऽभिवाञ्छति विश्रान्तिं तस्य क्रममिमं श्रृणु ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी, जो जीव इस संसार के भार को ढोते-ढोते थक गया है तथा मरण, मूर्च्छा आदि संकट समय को झेलकर जिसका शरीर जर्जर हो गया है, वह विश्रान्ति अवश्य चाहता है । परन्तु उसके लिए जो खास क्रम है यानी विश्रान्ति पाने के लिए प्राप्त किये जानेवाले उन-उन साधनों से उत्तम गुणों के लाभ का जो क्रम है, उसे आप सुनिये

सर्ग सन्दर्भ

छियालीसवाँ सर्ग समाप्त सैंतालीसवाँ सर्ग विस्तार से प्रस्तुत मुक्ति का साधनों के क्रम में दृढ़ वैराग्य की प्राप्ति तक के जितने साधन हैं, उन सबका पुनः वर्णन।