Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verses 2–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 2, 3
संस्कृत श्लोक
पूर्वं विवेककणिका यदा स्वहृदि जायते ।
संसारनिर्वेदमयी कारणाद्वाप्यकारणात् ॥ २ ॥
तदा श्रयन्ति सच्छायान्साधुत्वसुविशालिनः ।
अध्वश्रमहरांस्तापतप्ता मार्गतरूनिव ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
सवसो पहले विवेकरूफी अंकुर का उदय होने पर जिन गुर्णो की ग्राप्त होती हैं, उन्हें
बतलाते हैं ।
कारण विशेष से यानी ऐहिक यज्ञ, दान, तप आदि पापक्षय के हेतुभूत सत्कर्मों से या अकारण
से यानी पूर्वजन्मार्जित यज्ञ आदि सत्कर्मों से जभी अपने हृदय में पहले संसार से विरक्ति पैदा
करनेवाली विवेक की मात्रा उत्पन्न हो जाती है, तभी उत्तम छाया देनेवाले तथा साधुता के रूप से
चारों ओर फैले हुए गुणों का संसार ताप से तप्त पुरुष ऐसे आश्रय लेते हैं, जैसे सूर्य के ताप से तपे
हुए पुरुष मार्ग की थकावट हरनेवाले मार्ग के वृक्षों का आश्रय लेते हैं