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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

दूरे परिहरत्यज्ञान्यज्ञयूपानिवाध्वगः । स्नानदानतपोयज्ञान्करोति विबुधानुगः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसा होने पर पहले अज्ञानियों के संसर्ग का त्याग, यज्ञ-दान आदि में तत्परता तथा देवता की आराधना आदि गुण उत्पन्न होते है; यह कहते हैं । ऐसा पुरुष पहले तो अज्ञानियों को उस तरह दूर से ही छोड़ देता है, जैसे पथिक यज्ञयूप को दूर से ही छोड़ देता है। स्नान, दान, तप, यज्ञ आदि का अनुष्ठान करता है और निरन्तर तत्त्वज्ञो का पदानुसरण करता है