Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
पेशलं चानुरूपं च व्यवहारमकृत्रिमम् ।
लोक्यमाह्लादनं धत्ते चन्द्रविम्बमिवामृतम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस तरह चन्द्रमा का बिम्ब लोगों को आनन्द देनेवाला अमृत धारण
करता है, उसी तरह तत्त्ववेत्ता कोमल, अनुरूप, परिणाम में लोगों के लिए हितकारक तथा आनन्ददायी
कृत्रिम व्यवहार धारण करता है