Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
अन्तरेवानुभवति सर्वार्थान्प्रतिबिम्बितान् ।
आदर्शवदशेषेण प्रज्ञा नैर्मल्यशालिनी ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
दर्पण के सदृश, निर्मलता से शोभित बुद्धि अपने भीतर प्रतिबिम्बित समस्त
वस्तुओं का अपने अन्दर ही मन के विलास के रूप में पूर्ण अनुभव करती है