Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
तथानुगच्छति प्राज्ञः शास्त्रसाधुसमागमौ ।
यथात्यन्तानुषङ्गेण तावेवानुभवत्यसौ ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
विवेकसम्पन्न तत्त्वज्ञ पुरुष अभ्यास द्वारा शास्त्र
का ओर सेवा आदिवृत्ति से गुरुसमागम का वैसा निरन्तर अनुसरण करता है, जिससे कि गुरु के
उपदिष्ट अर्थ में अत्यन्त आसक्ति के कारण स्वप्न में भी शास्त्र एवं गुरु के चिन्तन तथा सेवन में
निरत होकर उन्हीं दोनों का (शास्त्र और गुरुसमागमका) अनुभव करता है