Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
कचत्काञ्चनकान्तेन विमलालोककारिणा ।
भुवनं भास्करेणेव भाति साधुः स्वतेजसा ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
विवेकी पुरुष
चमकीले सुवर्ण के सदुश चमक रहे तथा निर्मल प्रकाश करनेवाले अपने आत्मप्रकाश से सूर्य की
नाई समस्त भुवन को प्रकाशित कर देता है