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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

अभोगकृपणा कापि न चैवास्य प्रवर्तते । मुखे कान्तिरपूर्वैव चन्द्रे राहुमृते यथा ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

इस विवेकी के मुख में भोगलम्पटता से निर्मुक्त कोई अनिर्वचनीय अपूर्व ही कान्ति एेसे जगमगाने लग जाती है, जैसे राहु से छुटकारा पा जाने पर चन्द्रमा में कान्ति जगमगाने लग जाती है