Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
तृणीकृतत्रिजगतां महतामभिधेयताम् ।
स याति कल्पविटपी नभसीव दिवौकसाम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जिन लोगों ने तीनों जगत् को भी
तृणरूप समझ लिया है, उन महान् आत्माओं द्वारा यह ऐसे प्रशंसापद को प्राप्त होता है, जैसे स्वर्ग
में देवताओं द्वारा कल्पवृक्ष