Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
नित्यानादृतभोगोऽसौ ततोऽप्युचितया धिया ।
प्राप्तमप्युचितारम्भं भोगं न बहुमन्यते ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
सदा ही भोगों के प्रति वह आदर नहीं रखता, इसीलिए उन सिद्ध महात्माओं के
द्वारा अत्यन्त प्रसन्नता से दिये गये अनिषिद्ध सिद्धि आदि विषयों को भी श्रेष्ठ नहीं समझता उनकी
ओर कुछ भी अधिक आस्था नहीं रखता