Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
परार्थादानविरतिं पूर्वमभ्यस्य यत्नतः ।
आहर्तव्या विवेकेन ततः स्वार्थेष्वरक्तता ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
विवेकी को सबसे पहले प्रयत्नपूर्वक दूसरे
का धन लेने से निवृत्त हो जाना चाहिए और इसका भली प्रकार अभ्यास कर फिर अपने विवेक
से स्वार्थो से भी विरक्ति ग्रहण करनी चाहिए