Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
ततो भोगनिरासेन सह स्वार्थनिराकृतिः ।
परमायै सुविश्रान्त्यै क्रियते कृतिभिः क्रमात् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके बाद भोगनिवृत्ति के साथ-साथ
अपने स्वार्थो को भी क्रमशः तिलांजलि दे देनी चाहिए, क्योंकि तत्त्वज्ञ लोग उत्तम शान्ति के
लिए यही काम किया करते हैं