Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
वसन्तो नन्दनोद्यानमिन्दुरप्सरसः स्मृताः ।
इत्येकतः समुदितं संतोषामृतमेकतः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
सभी प्रकार के सुखो का कारण भी वही है, यह कहते हैं /
सुख के साधन एक ओर तो वसन्त, नन्दनवन, चन्द्रमा ओर अप्सराएँ कही गई हैं और एक
ओर पूर्ण सन्तोषरूपी अमृत कहा गया है यानी अकेला सन्तोषरूपी अमृत सुख देने की जितनी
सामर्थ्य रखता है उतनी वसन्त आदि सब मिलकर भी नहीं रखते