Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
संपद प्रमदाश्चैव तरङ्गोत्तुङ्गभङ्गुराः ।
कस्तास्वहिफणच्छत्रच्छायासु रमते बुधः ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
अर्थसम्पत्ति और प्रमदा-ये दोनों वस्तुएँ तरगों के सदृश थोड़ी
ही देर में नष्ट हो जानेवाली हैं ओर वे सर्पं के फनरूप छत्र की छाया ही हैं, अत: कौन विद्वान उनसे
खेल करेगा ?