Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
अर्थोपार्जनरक्षाणां जानन्नपि कदर्थनाम् ।
यः करोति स्पृहां मूढो नृपशुं तं न संस्पृशेत् ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
धन के उपार्जन ओर रक्षण में जो भारी यातनाएँ होती हैं, उनको जानकर भी
जो धन की इच्छा करता है, वह मूढ़ ओर नरपशु है उसे छूना तक नहीं चाहिए