Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
मनसो बाह्यमारम्भमान्तरं च लुनाति यः ।
समं वैतृष्ण्यदात्रेण तस्य क्षेत्रं प्रकाशते ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
जो पुरुष
सन्तोषरूपी हँसिये से एक साथ बाहर की इन्द्रियों के बरताव को और भीतर के संकल्प आदि को
काट डालता है, उसका खेत यानी ज्ञानबीज की उत्पत्ति का स्थान हृदय प्रकाशने लगता हे