Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 53

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 53

संस्कृत श्लोक

संसारनिर्वेददशामुपेत्य सत्संगमं शास्त्रमुपेत्य तेन । शास्त्रार्थभावेन निरस्य भोगान्वैतृष्ण्यदार्ढ्यात्परमार्थमेति ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

पुरुष को सबसे पहले संसार में विरागदशा प्राप्त करनी चाहिए, फिर सत्समागम ओर शास्त्रों का अभ्यास करना चाहिए, अनन्तर "तत्त्वमसि" आदि शास्त्रों के अर्थो की दृढ़ भावना कर भोगों से विरक्त हो जाना चाहिए, इतना करने के अनन्तर अभी कहे गये वैतृष्ण्य की यानी सन्तोष की दृढता बन जायेगी ओर फिर अपने असली स्वरूप को वह अवश्य प्राप्त हो जायेगा