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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verses 1–3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 48, verses 1–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 1-3

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । रूढे संसारनिर्वेदे स्थिते साधुसमागमे । शास्त्रार्थे भाविते बुद्ध्या भोगवैतृष्ण्य आगते ॥ १ ॥ जाते विषयवैरस्ये सज्जनत्वे तथोदिते । प्रकाशे सोन्मुखीभूते हृदये कलितोदये ॥ २ ॥ धनानि नाभिवाञ्छयन्ते तमांसीव विवेकिना । त्यज्यन्ते विद्यमानानि संशुष्कामेध्यपर्णवत् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

सबसे पहले केराग्य की दढता हो जाने पर पुरुष के जो विह होते हैं; उन्हे बतलाते हैं / महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, जब पुरुष को संसार से विरक्ति उत्पन्न हो जाती है, जब साधु पुरुषों का समागम प्राप्त हो जाता है, जब "तत्त्वमसि" आदि महावाक्यं का अर्थ बुद्धि द्वारा भावित हो जाता है, जब भोगों की तृष्णा चली जाती है, जब विषय नीरस बन जाते हैं, जब साधुता का उदय हो जाता है, जब प्रकाशमय आत्मा सामने आ जाता है तथा जब हृदय में अपने उदय की पूर्ण भावना हो जाती है, तब वह विवेकी पुरुष धनों को ऐसे नहीं चाहता, जैसे अन्धकारो को और यदि वे पास में विद्यमान हों, तो उनका ऐसे त्याग कर देता है, जैसे घर में से एकदम सूखे उच्छिष्ट पत्तलों का

सर्ग सन्दर्भ

सैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त अडतालीसवों सर्ग उत्तम वैराग्य दृढ होने पर पुरुष की जिन लक्षणों से स्थिति होती है तथा ज्ञान में निष्ठा हो जाने पर जिन लक्षणों से स्थिति होती है, उनका वर्णन।