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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 48, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

भाराय पान्थदृष्ट्येव दृश्यन्ते दारबन्धवः । यथाशक्ति यथाकालमुपचर्यन्त एव च ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

उपयोगी भी बर्तन आदि ढो ले जाने में असामर्थ्य रखने के कारण जैसे पथिको की दृष्टि से वे केवल भारभूत ही देखे जाते हैं, वैसे ही विवेकी पुरुष की दृष्टि से स्त्री, बन्धु आदि भी भारभूत देखे जाते हैं । परन्तु सहसा उनका त्याग वह नहीं करता, यथाशक्ति ओर यथासमय धीरे-धीरे उनका उपचार करता ही जाता है यानी छोड़ता जाता है