Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 48, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
एकबोधातिसंबन्धपरिणामान्न बोधता ।
न शून्यता नार्थतेति विद्धि तत्परमं पदम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
परमपदरूप जो वस्तु है, वह न बोधरूप है, न शून्यरूप है और न तो अर्थरूप ही है, यह आप
जान लीजिए, क्योकि समस्त वस्तुएँ अद्वय बोध के साथ एकरस होकर ही परिणत हँ । तात्पर्य
यह निकला कि यदि बोध के विषय पदार्थ होते, तो उनको लेकर बोधरूपता कह सकते, परन्तु
बोध विषय कोई पदार्थ तो त्रिकाल में भी नहीं है, इसी तरह अर्थ न होने के कारण अर्थरूपता
भी नहीं है । अर्थो की शून्यता को लेकर परमपद मेँ शून्यता कैसे हो सकती है ?