Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 48, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
स्वसंविन्मात्रविश्रामवताममनसां सताम् ।
न स्वदन्ते हि विषयाः पयांसि दृषदामिव ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
परमपद में विश्रान्ति पा जाने पर विषयों की विरक्ति सिद्ध हो जाती है, यह कहते हैं /
मनशून्य (मन की विलयदशा को प्राप्त) तथा आत्मतत्त्वसाक्षात्काररूप परमपद में विश्राम
किये हुए महात्माओं को विषय ऐसे अच्छे नहीं लगते, जैसे मनशून्य पत्थरों को दूध