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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verses 15–16

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 48, verses 15–16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 15,16

संस्कृत श्लोक

सर्वार्थमर्थरहितं महदेव पराणुवत् । अशून्यमेव शून्यात्म हृदयं वेद्यवेदिनः ॥ १५ ॥ अहंत्वं जगदीहादि दिक्कालकलनादि च । ज्ञस्य ज्ञानादि शून्यादि स्थितमेव न विद्यते ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

उस्र समय उसका मन किस तरह का रहता हैं 2 इस पर कहते हैं / भद्र, अवश्य जानने लायक आत्मवस्तु को जाननेवाले उस महात्मा का मन अर्थरहित है, और सम्पूर्ण अर्थो से पूर्ण भी है, क्योकि तत्त्वतः सभी तद्रूप हो गये है। अपरिच्छिन्न ब्रह्मरूप हो जाने के कारण महान्‌ ही है और दुर्लक्ष्य होने के कारण परमाणुरूप भी है, अशून्यरूप होता हुआ भी शून्यात्मक है, कारण कि अहन्ता, जगत्‌ की इच्छा आदि, दिशा (देश) और काल की कल्पना आदि तथा ज्ञाता के ज्ञान आदि जितने पदार्थ हैं, वे सब उसी से तो हुए हैं, अतः तद्रूप होने के कारण शून्यरूप नहीं हो सकता और शून्य आदि भी उसी से हुए है, अतः अशून्यरूप भी नहीं है। ऐसी स्थिति में तत्‌-तद्रूप से स्थित हुआ भी नहीं है, यह कहा जा सकता है