Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 48, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
ज्ञेनामलपदस्थेन दीपेनेव निरस्यते ।
तमो हार्दं तथा बाह्यं रागद्वेषभयादि च ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण
मलों से रहित आत्मपद में स्थिति करनेवाला ज्ञानी अपने हृदय में स्थित अज्ञानरूपी अन्धकार को
तथा बाहर के अन्धकार को एवं राग, द्वेष, भय आदि को, दीपक की तरह निकाल देता है