Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 48, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
रजोरहितसर्वाशं सत्त्वात्पारमुपागतम् ।
असंभवत्तमोरूपं प्रणमेत्तं नृभास्करम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, ऐसे पुरुषरूपी भास्कर को (सूर्य को) प्रणाम करना चाहिए, जिसका कि समस्त अंश रजोगुण
से शून्य है, सत्त्वगुण के प्रभाव से जो अज्ञानसागर से पार पा चुका है ओर जिसमें तमोगुण का
सर्वथा अभाव है