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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verse 37

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 48, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

भ्रमन्मनःपिशाचेऽस्मिन्कल्लोलजलदाकुले । संसाररात्रितिमिरे स्वात्मैवापूर्णचन्द्रमाः ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसमें मनरूपी पिशाच घूम रहा है, काम, क्रोधरूपी काले मेघो से जो सदा व्याकुल रहता है, ऐसे संसार रात्रि के घने अन्धकार में अपना आत्मा ही पूर्ण चन्द्रमा है