Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 48, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
त्यक्त्वा सर्वविकल्पौघान्विकारानर्थसंकरान् ।
पौरुषेणात्मनैवात्मा स्वयमेव प्रसाद्यताम् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, समस्त संकल्प-विकल्पों का, विकारों का और अर्थसंकटों का
परित्याग कर अपने ही पुरुषार्थ से अपनी आत्मा को स्वयं ही प्रसन्न कर लेना चाहिए