Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 48, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
विवेकदूतमुद्बोध्य हत्वा चित्तपिशाचकम् ।
आत्मनः पदवीं स्फारां जीवः कामपि नीयते ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
विवेकरूपी दूत को जगाकर और
चित्तरूपी पिशाच का विनाशकर यही चिदात्मा जीव को अपनी दिव्य अनिर्वचनीय स्थिति पैदा
करा देता हे