Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 48, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
सर्वत्रैष चिदात्मत्वाद्याति जागर्ति पश्यति ।
तेनैष सर्वतोलक्ष्यकरकर्णाक्षिपादभृत् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
चैतन्यात्मा होने से यही
सब जगह जाता है, जागता है ओर देखता है, इसलिए यही आत्मा लाखों, हाथ, पैर, कर्ण,
चक्षु और पैरों का चारों ओर से धारण करता है