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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verses 6–7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 48, verses 6–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

एकान्तेषु दिगन्तेषु सरःसु विपिनेषु च । उद्याने पुण्यदेशेषु निजेष्वेव गृहेषु वा ॥ ६ ॥ सुहृत्केलिविलासेषु शुभोद्यानाशनादिषु । शास्त्रतर्कविचारेषु न तथा स्थीयते चिरम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

उसीका विस्तार करते हैं / विवेकी जीव, एकान्त स्थाना में, दिगन्तों में, सरोवरों में, जंगलों में, उद्यानों में, पवित्र देशों में, अपने ही घरों में, मित्रों की विलासपूर्ण क्रीड़ाओं में, सुन्दर बाग आदि के भोजनों में, शास्त्रों के तर्कपूर्ण विचारों मे अज्ञानी की तरह दीर्घकाल तक आस्था बोधकर नहीं रहता या आसक्ति न होने के कारण दीर्घकालतक स्थित नहीं रहता है