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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । परिपुष्टविवेकानां वासनामलमुज्झताम् । महत्ता महतामन्तः काप्यपूर्वैव जायते ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जिनका विवेकज्ञान परिपुष्ट हो गया है ऐसे वासनारूपी मल का परित्याग कर रहे महात्माओं के अन्दर कोई अपूर्वं ही महत्ता उत्पन्न होती है

सर्ग सन्दर्भ

अड़तालीसवाँ सर्ग समाप्त उनचासवाँ सर्ग दृढ़ विवेकज्ञान सम्पन्न पुरुषों की जैसी महिमा होती है तथा जैसा उनको संसार भासता है, उन सबका वर्णन ।