Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
यथास्थितस्य साहंत्वं विश्वं चित्तं विलीयते ।
ज्ञस्यावाच्यमचित्त्वं सत्स्वरूपमवशिष्यते ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानी का वह अवशिष्ट सन्मात्र चित्तरूप ही क्यो नहीं होगा, क्योकि चित्त के रहने पर ही
चिति की अभिव्यक्ति ग्रप्निद्ध है, चित्त का नाश होने पर उसकी स्थिति नहीं रहती, यह आशंका
कर कहते हैं /
यदि अन्यथा स्वभाव जाड्य में स्थित ज्ञानी का अहंकार सहित सारा विश्व और चित्त विलीन
हो जाता, तब तो वह ज्ञानी जडसन्मात्ररूप से अवशिष्ट रह जाता किन्तु यह बात नहीं है । यहाँ तो
बात यह है कि यथाभूत चिदेकस्वभाव में स्थित ज्ञानी का अहंकार सहित सारा संसार और चित्त
तत्त्वज्ञान से विलीन हो जाता है इसलिए वह सत्स्वरूप से ही अवशिष्ट रह जाता हे । उस समय
ज्ञानी का परिशिष्ट चिदेकरस अचिद्रूप है, यह नहीं कहा जा सकता अतः उस समय चिदेकरस
सन्मात्र को परिशेष की ही सिद्धि हो जाती है