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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verses 16–18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verses 16–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

क्लिश्यते केवलं बुद्धिरुत्तराधरदर्शनैः । स्तोकयाभ्यस्तया युक्त्या सत्योऽर्थो ह्यवगम्यते ॥ १६ ॥ विराडोजोविरहितं कार्यकारणतादिभिः । भूतभव्यभविष्यस्य जगदङ्गस्य संभवम् ॥ १७ ॥ येन बोधात्मना बुद्धं स ज्ञ इत्यभिधीयते । अद्वैतस्योपशान्तस्य तस्य विश्वं न विद्यते ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि सन्मात्ररूप सबका स्वरूप है, तो फिर वह सबको सुलभ क्यो नहीं है 2 यदि यह आशंका हो, तो उसका उत्तर यही हैं कि ऊँच-नीच (विषयों में बुद्धि की चंचलता के कारण स्थिरता का अभाव होने से ही वह स्वरूप सबको दुलभ नहीं है, यह कहते हैं । ऊँच-नीच विषयों की ओर दौड़ने से बुद्धि क्लेश पाती है, इसलिए वह सन्मात्र स्वरूप सबको सुलभ नहीं है। हाँ, धीरे-धीरे युक्ति का अभ्यास करने से सत्य अर्थ अवगत हो जाता है