Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
बाह्यार्थता नान्तरत्वं तद्वद्बोधवशाद्व्रजेत् ।
नासादृश्यं हि बोधत्वं गन्तुं शक्तं जडं क्वचित् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
जड़स्वरुप बाह्य पदार्थों के आकार से विति भले ही विक्रत न हो कके, किन्तु जड़ का
तो विकार हो सकता हैं / तत्वबोध केवल भीतर स्थित चिदाकाररूप से वह विक्ृत क्यों न
हो जाय, इस पर कहते हैं /
जैसे जड़ बाह्य पदार्थों के आकार से चिति विकृत नहीं हो सकती वैसे ही जड़ बाह्यपदार्थता
भी तत्त्ववोधवश भीतर स्थित चिदाकाररूप से विकृत नहीं हो सकती, क्योकि सर्वथा असदृश
जड़ पदार्थ कहीं भी बोधरूप नहीं हो सकता