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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

चित्तभ्रान्तिर्जगदिति प्ररूढे प्रत्यये सताम् । बाह्यश्चान्तश्चरन्नक्रग्रहो मोहश्च शाम्यति ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

यह सारा संसार चित्त की एकमात्र भ्रान्ति है, ऐसी सज्जनों को दृढ़ प्रतीति हो जाने पर बाहर शब्दादि विषयों के लिए उत्पन्न होनेवाला तथा भीतर संकल्प विकल्पादि रूपों से भ्रमण करनेवाला अतएव हृदय के भीतर और बाहर दोनों जगह संचार करने में समर्थ मनसहित इन्द्रियों का समूहरूपी एक तरह का मगर तथा उसका मूलभूत अज्ञान एवं वासना, काम, कर्म आदि ये सबके सब शान्त हो जाते हैं