Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
नो चेत्तत्प्रतिवाक्यार्थात्तद्ग्रन्थिर्विनिवर्तते ।
भूतोत्सादनसूत्रस्य प्रतिपत्तृपदं यथा ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
(4) परन्तु कूटस्थ बोधस्वभाव से अलग किसी भाव पदार्थ की उत्पत्ति का निरूपण हो नहीं सकता
। देखिये, विचार कीजिये क्या वह उत्पत्ति पहले स्वयं उत्पन्न होकर भावों को अपने से विशिष्ट बनाकर
स्थित होती है या बिना स्वयं उत्पन्न हुए ही । इसमें यदि आप दूसरा पक्ष स्वीकार करते हैं, तो उस
पक्ष मेँ हमारा आपसे यह कहना है कि तब तो सींग भी खरगोश को अपने से विशिष्ट बना सकता हे ।
रह गया पहला पक्ष | इसमें तो यह समझ लीजिये कि स्वयं उत्पत्ति आदि से विशिष्ट हुई वह भाव
पदार्थरूप ही होगी, न कि भावविकार । इसी तरह उसकी उत्पत्ति भी समझ लीजिये । इस रीति से
इसी रीति से (तत् ओर त्व“ पदार्थ का शोधन होने पर सम्पूर्ण महावाक्य अखण्ड अर्थ
के बोधन द्वारा सम्पूर्ण सन्देहो के ग्रन्थि भेदन में समर्थ होते हैं / अन्यथा वे भ्रूत-प्रेतों को भगाते
समय पढ़े जा रहे मन्त्रों के भीतर आये हुए हूं! फट्” आदि पदों की तरह बिलकुल अनर्थक
सिद्ध होगे / वे सभी महावाक्य एकमात्र श्रवण के बल से प्राणी को इस ससार से छुटकारा दिला
देते हैं; ऐसी हमें कल्पना करनी चाहिए, यह कहते हैं /
यदि ऐसी बात न हो, तो फिर ब्रह्मप्रतिपादक महावाक्यों के अर्थ से संसार की ग्रन्थि निवृत्त
हो जाती है, यह कहना भी वैसे ही बिना अर्थ का सिद्ध होगा, जैसे कि भूत-प्रेतादि को दूर
भगानेवाले मन्त्रों के अन्तर्गत "हु", "फट्" आदि पद