Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
जगद्बोधैकतां बुद्ध्वा बोद्धव्या तावदव्रणम् ।
अत्यन्तपरिणामेन यावत्सापि न बुध्यते ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
"तत्" पदार्थ के शोधन के लिए
पहले "वाचारम्भण' न्याय से जगत् तथा इसके कारणभूत ईश्वर के स्वरूप की एकता जान
करके उसके बाद "त्वं" पदार्थ के शोधन के लिए “स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्" इस श्रुति द्वारा
दिखलाये गये मार्ग से प्रत्यक् चैतन्य को भी असंग अद्रय समझना चाहिए । (कब तक इन दोनो
पदार्थों के शोधन में मनुष्य को लगे रहना चाहिए, इस पर कहते हैं // जब तक इन दोनों पदार्थों
के अखण्डैकरस वाक्यार्थरूप अत्यन्त परिणाम द्वारा वह अखण्डाकार वृत्ति भी नहीं जान ली
जाती, तब तक साधक मनुष्य को इन दोनों पदार्थों के शोधन में तत्पर रहना चाहिए