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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

सबाह्याभ्यन्तरे चित्ते शान्ते भाति स्वभावता । शीतलां व्योमनिर्भासां तामेवाश्रित्य शाम्यताम् ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

बाह्य तथा आभ्यन्तर चित्त के बिलकुल शान्त हो जाने पर अपनी चित्स्वभावता प्रकाशित होती है, इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, प्रत्येक पुरुष को चाहिए कि वह आकाश की नाई पूर्ण स्वच्छ तथा शीतल उसी चित्स्वभावता का आश्रय कर शान्त होवे