Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
वैतृष्ण्यशान्तमनसो निरोधमलमीयुषः ।
स्थितिर्वज्रसमाधानं विना नान्योपपद्यते ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
कत्र की तरह दृढ़ केराग्य एवं शान्ति चुखोत्कर्ष की स्थिरता से भी उसका वर्णन करते हैं /
अनवस्थादोष मानने पर तो निर्विकार भावों की अनवस्था ही बनी रहेगी, अतः यह निश्चित है कि किसी
के उत्पत्ति आदि विकारों का कोई भी विद्वान् किसी तरह से निरूपण नहीं कर सकता । इसलिए जब यों
ज्ञान हो गया कि जितने भाव पदार्थ हैं वे सबके सब कूटस्थ बोधरूप ही हैं तब कहिये, कौन किसके
लिए किसका अतिवहन करे या वह अतिवहन भी किस रूप का हो अथवा कौन-सी उसकी अन्य बुद्धि
है ? वह भी तत्त्वतः ज्ञात हो ही जाती है, यह तात्पर्य है।
पूर्ण वैराग्य से सर्वथा शान्त मन तथा पूर्णं निरोध को प्राप्त पुरुष की वजतुल्य, दृढ़ समाधि के
अतिरिक्त कोई दूसरी स्थिति नहीं उपपन्न होती