Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
यथा बाह्यार्थवैतृष्ण्ये नोपशाम्यत्यलं मनः ।
न तथा शास्त्रसंदर्भैर्नोपदेशतपोदमैः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
शान्ति आदि साधनो में वैराग्य को ही सवात्कष्ट साधन वतलाते है /
बाह्य पदार्थों से वैराग्य होने पर जैसा मन पूर्णरूप से शान्त होता है, वैसा वह शास्त्रों के
विचार, उपदेश, तप या इन्द्रियों के निग्रह से भी नहीं होता