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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verses 46–47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verses 46–47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 46,47

संस्कृत श्लोक

मनस्तृणस्य सर्वार्थवैतृष्ण्याग्निर्विबोधितः । सर्वत्यागानिलैः संपदत्यापदिति भावनात् ॥ ४६ ॥ बहिरन्तश्च मोहश्च पिण्डग्राहोऽर्थवेदनम् । ज्ञप्तिरेवेति कचति ज्ञात्वा मणिरिवात्मनि ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

“सारी सम्पत्तियाँ आपत्तिरूप षे इस तरह की भावना से मनरूपी महातृष्णा के बीच में सर्वत्यागरूप पवन से विबोधित सब पदार्थो से उत्पन्न वैराग्यरूपी अग्नि परमब्रह्मसाक्षात्कार ज्वालारूप से प्रज्वलित होकर बाहर और भीतर सर्वत्र प्रसिद्ध जो मोहान्धकार तथा मोहान्धकारग्रयुक्त जो चोर, यक्ष आदि की कल्पना के तुल्य ब्रह्माण्ड का भूत-भौतिक मूर्तरूपी पिण्ड है यानी ब्रह्माण्ड का साकार ज्ञान है एवं चक्षु आदि इन्द्रियों से रूप, रस आदि पदार्थो का जो अनुभव है, वहाँ सब चिदात्मा ही है यों एकमात्र अखण्ड- अद्भय स्वभाव सबको बनाकर ऐसे देदीप्यमान होती है, जैसे कि वजादिमणि अपने प्रतिबिम्बित हुई वस्तुओं को अपने स्वरूप में बिलकुल मिलाकर उन्हे प्रकाशित करते हुए स्वयं देदीप्यमान होती हैं