Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
नरनागासुरागारगिरिगह्वरदृष्टिभिः ।
चितिरेवेति विसृता धूमोऽम्बुदतयेव खे ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
मनुष्य, नाग तथा असुर एवं उनके स्थान पर्वत तथा गुफा आदि के रूपों से वह
चिति ही नाना प्रकार के वैचित्र्य को वैसे प्राप्त है, जैसे आकाश में मेघों के रूप से धूआँ