Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
जीवकाजीर्णशफरी व्योमवारिविहारिणी ।
मोहजालेन वलिता न स्मरत्यात्मनि स्थितिम् ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
इन चार प्रकार के शरीररूपी चिति के विवर्तस्वरूप नदियों के अन्दर रहनेवाली जीवरूपी
मछलियाँ मोहजाल में फँस जाने के कारण स्वतत्त्त का स्मरण नही करती, यह कहते हैं /
चिदाकाशरूपी जल में विहार करनेवाली बेचारी जीवरूपी जीर्ण मछली मोहजाल में फँस जाने
के कारण अपनी आत्मा में स्थिति का स्मरण नहीं करती